बाल दिवस पर सूरज कुमार (उन्नाव ब्यूरो) की खास रिपोर्ट।
आज सुबह जब मै अपने घर के बाहर बगीचे में बैठा था तो स्कूल जाते हुए परिषदीय विद्यालयों के बच्चों को देखा वह अपनी पूरी यूनिफार्म में पास के ही विद्यालय में बाल दिवस के मौके पर स्कूल में होने वाले प्रोग्राम में भाग लेने जा रहे थे । ये बच्चे इतने खुश थे कि उनकी खुशी शब्दों में बयां नही की जा सकती । उनको देखकर अपना बचपन याद आ गया। और ऐसा प्रतीत होने लगा  कि मेरे वो  स्कूल वाले  दिन याद आ गए जब हम  लोग  स्कूल जाया करते थे।  तभी मां ने आवाज आयी कि उठेगा कि नही पूरे 8 बज गए है । तब जाकर पता चला कि मैं एक सपना देख रहा था। तभी खिड़की के पास से झांककर देखा तो कुछ बच्चे एक एक - एक पीठ पर बोरी लटकाये कूड़ा करकट उठाने जा रहे थे यह देखकर मेरी आंखों में आँसू आ गए। और ये सोचने लगा कि ये सब कब तक चलेगा। क्या ? होगा        जंहा एक तरफ बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है। वंही दूसरी तरफ
बच्चो का बचपन खेल कूंद और पढ़ाई के बगैर कूड़े कचरे को उठाने में बीतता है।
अपने न्यूज़ रीडर / व्यूअर से निवेदन है कि  अपना मत जरूर दें।
आज का सवाल।
क्या भारत में जो आज पूरे विश्व मे अपना परचम लहराए हुए है इस प्रकार की होने वाली मजदूरी जिससे बच्चों का भविष्य और उनके सपने कूड़े - कचरे तक ही सीमित हो पाते हैं। इस तरह के बच्चों की मदद किस प्रकार की जा सकती है?

Post A Comment: