कभी कबाड़खाने में काम किया करता था यह बिहारी क्रिकेट कमेंटेटर, आज करोड़ों दिलों पर करता है राज….

शिव कुमार/ढाका संवाददाता की खास रिपोर्ट

आइए जानें क्रिकेट कमेंटेटर लिटिल गुरु जी के जीवनी के बारे में 

 कहते हैं कि हिम्मत जुनून और जज्बा इंसान को हर मुश्किलों से लड़ने में मदद करता है. कुछ ऐसी ही संघर्ष की कहानी है एक बिहारी कमेंटटर की जो आज लाखों दिलों पर राज करता है. दुनिया जिसे लिटिल गुरु के नाम से जानती है. लेकिन यह नाम और मुकाम पर कैसे पहुंचे इसकी पीछे एक लम्बी कहानी है जिसे खुद लिटिल गुरु ने बयां किया है. इसलिए आज इस प्रसिद्ध रेडियो क्रिकेट कमेंटेटर की कहानी आज लिटिल गुरु से बातचीत के उपरांत आप सभी के बीच.मोहम्मद मेराज़ जिसे आज लिटिल गुरु के नाम से दुनिया जानती है. 17 मई 1984 को बिहार इस गौरवशाली महात्मा गांधी की कर्मभूमि पूर्वी-चंपारण जिले के चिरैया प्रखंड अंतर्गत एक छोटे से गाँव भलुआही इस बिहार के लाल का जन्म हुआ इनके पिता जी का नाम मोहम्मद अमीर और माता का नाम शाहजहाँ बेगम. अपने माता-पिता की 5 संतानों में दूसरे नंबर, 4 भाई और 1 बहन.मां-पिता जी ने बड़े प्यार से नाम मोहम्मद मेराज़ रखा जब होश संभाला तो अपने आप को देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित गोविंदपुरी मोहल्ले में पाया. पिताजी उस क्षेत्र के जाने माने उद्योगपति थे. दरअसल उनकी एक्सपोर्ट गारमेंट्स की 2 फैक्टरियां थीं, जिनमें लगभग 500 कारीगर काम करते थे. इसलिए जीवन में सिर्फ सुख ही सुख देखे थे, दुःख क्या होता है इसका एहसास न था. जो फरमाइश करते, झट से पूरी कर दी जाती.


*👉🏻नाम के साथ लिटिल जुड़ा….*

इनके पिता जी को लोग प्यार से मास्टर जी कहते थे, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक टेलर मास्टर से की थी, परंतु अपने संघर्ष और लगनशीलता की वजह से सफलता पाई. मेराज़ पिता के बहुत प्यारे थे इसलिए वो कभी कभी अपनी फैक्ट्री में घुमाने पिता जी के साथ चले जाते. फैक्ट्री के कारीगरों ने कहा कि मास्टर जी का बेटा है तो इसके नाम लिटिल मास्टर होना चाहिए, यानी छोटा मास्टर जी. बस वहीं से मेराज़ का नाम लिटिल हो गया. कहते हैं न कि सुख उस पंछी की भाँति है, जो कभी भी उड़ सकता है.मास्टर साहब कर्ज में इतने डूब की फैक्ट्री घाटा में चला गया जिसके कारण दोनों फैक्ट्रीयां, मकान तक बिक गया. राजा रंक बन गए समय ने मेराज़ को अपने पुरे परिवार समेत बिहार लौटने पर मजबूर कर दिया. 8 साल की उम्र में बिहार की धरती पर लिटिल ने पहला कदम रखा ज़िन्दगी के थपेड़ों से अनजान गाँव का नाम सुनकर ही रोमांचित था. यह जानने के लिए की गाँव होता कैसा है. आज भी एक घटना को याद कर लिटिल गुरु मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते हैं. दिल्ली से बिहार लौटने के क्रम में पटना से ग्रामीण इलाकों में आने के समय बाँस को देखा जो 8वें अजूबे की तरह था जिसे गन्ना समझ रहे थे लेकिन ये भ्रम दूर हो गया.जीविका के लिए लिटिल के पिता फिर से वापस दिल्ली कूच कर गए. इधर इनकी पढाई भी शुरू हो गई. दिल्ली से आया लड़का भोजपुरी नहीं समझ पाता हालांकि समयानुसार अपने-आप को ढालना सीख लिया. बच्चे उपहास उड़ाते भोजपुरी नहीं आने के कारण फिर भी हिम्मत नहीं हारी और भाषा पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली. जैसे-जैसे बड़ा होता गया सुख-दुःख के बारे में अनुभूति भी होती गई दिल्ली की चकाचौंध कहीं पीछे छुट गई थी. 2001 में मैट्रिक और 2003 में इंटरमीडिएट करने के बाद जिन्दगी की असली संघर्ष हुआ शुरू.

*👉🏻जिन्दगी की असली संघर्ष जहाँ कबाड़ख़ाने में काम करना पड़ा….*

लिटिल बताते हैं कि मोतिहारी के लक्ष्मीनारायण दुबे कॉलेज में नामांकन कराने के बाद पिताजी की अचानक तबियत खराब हो गई. वो गांव आ गए और अक्सर बीमार रहने लगे. अब परिवार चलाने का सारा जिम्मा बड़े भाई पर थी. कमाई करने दिल्ली गया लेकिन बहुत दिनों तक कोई खोज खबर नहीं मिली कहीं गुम हो गया. परिवार पर दोहरी मुसीबत आन पड़ी घर का बड़ा बेटा लापता हो गया और साथ ही खाने के लाले पड़ने लगे. ऐसी स्थिति में घर-परिवार की जिम्मेदारी का बोझ उठाना मेराज़ की मजबूरी बन गई. एक तो पिता जी की दवाओं का खर्च, और ऊपर से परिवार का खर्च चलाना. मजबूरन गांव के ही एक व्यक्ति के कबाड़खाने में 1200 रुपए महीने की पगार पर काम करना शुरू कर दिया. लेकिन ज्यादा पैसे कमाने के चक्कर में कुछ दिनों बाद दिल्ली की ओर प्रस्थान किया.दिल्ली अब लिटिल के लिए बिल्कुल ही अनजान शहर जैसा था दिल्ली के तुगलकाबाद में एक्सपोर्ट गारमेंट की फैक्ट्री में हेल्पर की नौकरी बड़ी मुश्किल से मिली. मैनेजर ने मजबूरी का फायदा उठाते हुए 12 घंटे की ड्यूटी के सिर्फ 2000 पगार रखी. कभी ऐसे कम्पनियों के मालिक का बेटा आज खुद एक मजदुर के रूप में कम कर रहा था. इतने कम पगार में घर रुपए भेजना बड़ा मुश्किल था अपनी अच्छी इमेज बनाकर सिलाई के कुछ गुर सिखा जिसके बाद ओखला इंडस्ट्रियल एरिया में दूसरी फैक्ट्री में सिलाई का काम करने लगा. फिर घर भी पैसे भेजने शुरू किये. इसी दौरान एक घटना हुआ जिसमे बिछड़े दो भाई एक-दुसरे से मिल गए. उनके बड़े भाई बंधुआ मजदुर के रूप में थे दिल्ली के सरिता विहार इलाके में पुलिस के हस्तक्षेप से उनकी आज़ादी हुई. समय के अनुसार बड़े भाई और बहन की शादी हो गई.

*👉🏻पहला प्यार और अंजाम पर पिताजी का देहांत…*

साल 2007 में एक विवाह समारोह में मेराज़ ने एक लड़की को देखा. जिससे पहली नजर में ही प्यार हो गया स्वजातीय होने के कारण किसी प्रकार की कोई अड़चन नहीं आई लड़की भी शादी के लिए हामी भर दी. लेकिन इसी दौरान गुरु ने के पिता इस दुनिया से चल बसे इस दुखद घटना के वाबजूद कुछ बुद्धिजीवियों के सुझाव से विवाह अपनी निर्धारित तिथि पर ही हुआ. शादी के बाद ह्युंडई फोर व्हीलर कंपनी में जॉब करने के दौरान तबियत खराब हुई दोनों किडनी में स्टोन की समस्या. दुसरी तरफ भाइयों ने बिमारी के कारण उन्हें अलग कर दिया.इस मुश्किल के घडी में एक दोस्त मुकेश ने कोचिंग में पढ़ाने की सलाह दी, सोचा कि बेकार से बेगार भला. फिर क्या शुरू कर दिया कोचिंग में पढ़ाना, माहौल बड़ा ही पॉजिटिव, प्रत्येक शिक्षक जीवन मे तरक्की की ही बातें किया करते जिससे हौसला मिलता. सभी शिक्षकों से बहुत सहयोग मिला और सभी काफी अच्छे दोस्त बन गए. उनमें एक शिक्षक विजय जी ने ने मेराज़ आज के मुकाम तक पहुंचाने में बड़ी भमिका निभाई. 23 सितंबर 2010 को मेराज़ के छोटी सी बगिया में सिमरन नाम का फूल खिला. प्रथम संतान पाकर पति-पत्नी दोनों बहुत प्रसन्न हुए घर मे हमेशा एक किलकारी गूंजती रहती, जिससे ज़िन्दगी के संघर्ष का आनंद बढ़ गया था. आज मेराज़ 1 लड़का और 1 लड़की के पिता हैं 25 नवंबर 2013 को उनके आंगन में रेहान फ़ज़ल ने कदम रखा जैसे दोनों बच्चों को पाकर उनका जीवन ही धन्य हो गया.

*👉🏻ऐसे हुई क्रिकेट कॉमेंट्री की शुरुआत…*

विद्यार्थी जीवन मे एक अच्छा क्रिकेट खिलाड़ी रहने के कारण मेराज़ कि खेल से अपने क्षेत्र में मैंने अच्छी ख्याति थी. साथ ही क्रिकेट कॉमेंट्री करने का भी शुरू से ही शौक था. जहां भी किसी क्रिकेट टूर्नामेंट में जाता, अपनी बल्लेबाज़ी की बारी आने से पहले कॉमेंट्री कर लिया करता. अमूमन टीम में 5 या 6 नम्बर पर बल्लेबाजी करता जिसके कारण पर्याप्त समय होता था कि कुछ ओवर कॉमेंट्री किया जा सके. कॉमेंट्री तो शौकिया तौर पर ही किया करता इसमें कोई कैरियर बनाना है, इस बारे में मेराज़ ने कभी सोचा भी नहीं था. बचपन ऐसे गाँव में गुजरा जहां बिजली न के बराबर रहती और टीवी देखना एवरेस्ट चढ़ जाने के बराबर कारण. साफ कुछ आता नहीं था बस समय-समय पर एंटीना घुमाते रहिए. इस वजह से रेडियो ज्यादा लोकप्रिय था ऑल इंडिया रेडियो की क्रिकेट कॉमेंट्री! विनित गर्ग, सुशील दोषी, अमरेंद्र सिंह, इफ्तेखार अहमद, सुनील वैद्य, संजय बैनर्जी, कुलविंदर सिंह कंग, सुरेश सरैया इत्यादि को सुनते हुए बड़े हुए जिसके कारण कॉमेंट्री के दौरान इनके द्वारा कही गई बातों को फॉलो करता. जिसके कारण मेराज़ की कॉमेंट्री में पकड़ शुरू से ही रही.कोचिंग-ट्यूशन के बाद बाकी बचे समय में मेराज़ के अंदर का खेल प्रेमी फिर से जागने लगा जहां भी कोई टूर्नामेंट आयोजित होता, वहां बुलावा पर कॉमेंट्री करने पहुँच जाते, पहले पार्ट टाइम कॉमेंट्री करते थे, अब फुल टाइम हो गई थी. पहले शौकिया ही करते थे, अब कॉमेंट्री के पैसे भी मिलने लगे. लिटिल गुरु बताते हैं कि ऐसे ही एक बार पूर्वी-चंपारण जिले के चकिया गांधी मैदान में कॉमेंट्री के लिए पहुँचा. इतना बड़ा और भव्य टूर्नामेंट मैंने पहली बार देखा था. यही टूर्नामेंट उनके के लिए ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. यहाँ इनके कॉमेंट्री के लोग कायल हो गए. मुजफ्फरपुर टीवी चैनल के लिए फुटबॉल कॉमेंट्री कर चुके कॉमेंटेटर जोहा अफ़ज़ल से मुलाकात हुई. उन्होंने प्रोत्साहित किया कि आप ऑल इंडिया रेडियो जॉइन कीजिए. जहाँ से रेडियो के लिए मन में अंकुर फूटा.
साल 2013 में मोतिहारी के गांधी मैदान में सी.आर.पी.एफ. की 153वीं बटालियन द्वारा आयोजित टूर्नामेंट में उद्घाटन मैच में बुलाया गया कॉमेंट्री के लिए लेकिन बाद में किसी ने दुबारा आने के लिए नहीं कहा. लगा शायद इन लोगों को कॉमेंट्री पसंद नहीं आई परंतु अगले दिन उनके पास 12 बजे फोन आता है सी.आर.पी.एफ के डिप्टी कमांडेंट का कि आप आज क्यों नहीं आए. आपको सुनने के लिए आज हमारे बॉस यानी कमांडेंट साहब समय निकाल कर आए हैं. ये शब्द निश्चित रूप से उनके लिए हौसला बढ़ाने वाला था. जिसके बाद फाइनल में जिलापदधिकारी द्वारा सम्मानित किया गया जिसके बाद उन्होंने सोच लिया था कि अब पीछे मुड़कर नहीं देखना है.


लिटिल गुरु कहते हैं कि उन दिनों ऑल इंडिया रेडियो की कॉमेंट्री विलुप्त हो रही थी किसी श्रृंखला की कॉमेंट्री होती, तो किसी की नहीं. ऐसे में यहाँ प्रयास करना समय बर्बाद करने जैसा लगा. फिर सोचा कि क्यों न नेपाली एफएम चैनल पर कॉमेंट्री प्रसारित की जाए, क्योंकि इनका जिला नेपाल से सटा हुआ है. नेपाल के सीमावर्ती जिलों में नेपाली एफएम काफी लोकप्रिय था बस फिर क्या, मन में ठान लिया कि यहीं कॉमेंट्री प्रसारित करनी है. परंतु जब ये प्रस्ताव एफएम वालों को बताया तो उन्होंने इसे सिरे से खारिज कर दिया. विदित हो कि नेपाल में फुटबॉल ज्यादा लोकप्रिय है इसलिए एफएम वाले क्रिकेट में दिलचस्पी लेने से कतरा रहे थे इस स्थिति में मेराज़ हताश और निराशा के सागर में जा डूबे.ऐसी स्थिति में इनके दोस्त और कोचिंग के साथी शिक्षक विजय कुमार जी ने हौसला दिया. कई मिसालें दीं, प्रोतसाहित किया, कई सारी वास्तविक घटनाएं बताईं, जिनमें लोगों ने लंबे संघर्ष और बुलंद इरादों से अपने उद्देश्य में कामयाबी पाई. मेराज़ फिर से हिम्मत जुटाकर नेपाल पहुंचा एफएम के मालिक से कहा कि आप सिर्फ 2 मैच करके देखो, अगर आपके एफएम की टीआरपी न बढ़ गई तो कहिएगा. लिटिल गुरु के मुताबिक, “आखिरकार कई दिनों की भागदौड़ के बाद 2013 के आईपीएल में कॉमेंट्री प्रसारित करने पर विचार हुआ. इसके लिए नेपाल संचार निगम से स्वीकृति के अलावा जरूरी कागजी खानापूर्ति के बाद हमलोग तैयार थे कॉमेंट्री के लिए. लेकिन किन्हीं कारणोंवश पहले 2 मैचों की कॉमेंट्री न हो सकी.”

*👉🏻एसी में भी पसीने से तरबतर था….*

लितिन गुरु कहते हैं, “5 अप्रैल 2013 का वो दिन जब रेडियो पर पहली बार मेरी आवाज़ गूँजनेवाली थी. दिल बल्लियों उछल रहा था रोमांच के मारे आखिर वो घड़ी भी आ पड़ी जब स्टूडियो में कॉमेंट्री के लिए तैयार थे. पूरे क्षेत्र में इस प्रसारण को लेकर एक अलग ही माहौल था. पूरा नेपाल का तराई इलाका अपने रेडियो सेट के पास कान लगाकर चिपका हुआ था. क्योंकि एक इतिहास कायम होनेवाला था.” हालांकि इन सारी बातों को सोचकर मेराज़ नर्वस हो गए. एसी में भी पसीने से तरबतर, इस स्थिति को मैनेजर ने भांपते हुए संयम से काम लिया. केबिन में आकर कहा कि, “रेडियो में कुछ टेक्निकल फॉल्ट हो गया है, जिसकी वजह से हमें रेंज घटानी पड़ रही है. प्रसारण फिलहाल हमारे शहर तक ही रहेगा.” नेपाल में क्रिकेट प्रेमी न के बराबर हैं, इसलिए मुश्किल से 50 रेडियो ही ट्यून हुए होंगे. सुनकर मेराज़ को निराशा तो हुई पर दिल का डर भी कम हो गया. लिटिल गुरु हँसते हुए कहते हैं, “फिर क्या था, आईपीएल के 6ठे सीजन के तीसरे मैच में हैदराबाद सनराइजर्स और पुणे वारियर्स की टीमें हैदराबाद के राजीव गाँधी इंटरनेशनल स्टेडियम में टकराईं उस टकराहट की पहली बॉल की गूंज जो मेरे मुख से नेपाली एफएम रेडियो के इतिहास में पहली बार गूंजी, वो आजतक बदस्तूर जारी है.”

आज नेपाल के तराई एवं बिहार के सीमावर्ती पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सीतामढ़ी, शिवहर, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, गोपालगंज, सिवान, छपरा इत्यादि जिलों में 1 करोड़ से अधिक लोगों तक क्रिकेट के तीनों प्रारूपों टी-20, एकदिवसीय एवं टेस्ट की कॉमेंट्री पहुंचाने का श्रेय लिटिल गुरु को मिला. कॉमेंट्री का आलम अब यह है कि नेपाली लोग भी अब क्रिकेट और कॉमेंट्री के मुरीद हो चुके हैं. कभी सोचा नहीं था, इतनी सफलता और लोगों का प्यार मिलेगा.

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