इस बार 8 दिन की होगी चैत नवरात्री
          विनय कुमार मिश्र
नवरात्रि साल में दो बार आती है पहली चैत्र नवरात्रि और दूसरी शारदीय नवरात्र। इसके अलावा गुप्त नवरात्रि पर भी लोग मां दुर्गा की पूजा अर्चना करते हैं। चैत्र नवरात्र से नववर्ष के पंचांग की गणना शुरू होती है। नवरात्रि के नौ दिन मां के अलग-अलग स्वरुप की पूजा की जाती है। इस बार नवरात्रि 18 मार्च से शुरू हो रहे हैं। नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना की जाती है। इसके बाद नवरात्र के नौ दिन मां के लिए उपवास रखा जाता है। दसवें दिन कन्या पूजन के पश्चात उपवास खोला जाता है। आषाढ़ और माघ मास के शुक्ल पक्ष में पड़ने वाले नवरात्रि गुप्त नवरात्रि कहलाते हैं।
लेकिन इस बार नवरात्र 8 दिन की होगी। 18 मार्च से शुरू होने वाले नवरात्रि 25 मार्च तक चलेंगे। 25 मार्च को अष्टमी और नवमी तिथि एक ही दिन हो रही है। दरअसल प्रतिपदा तिथि 17 मार्च को शाम से लग ही है इसलिए 18 मार्च को शाम तक ही नवरात्रि के कलश स्थापना होगी
चैत्र नवरात्र घट स्थापना का शुभ मुहूर्त
इस बार यानि चैत्र नवरात्रि 2018 को घट स्थापना का शुभ मुहूर्त 18 मार्च सुबह 6 बजकर 31 मिनट से लेकर 7 बजकर 46 मिनट तक है। चौघड़िया मुहूर्त के अनुसार 09:27 से लेकर12:29 लाभ अमृत चौघड़िया है  14:00 से लेकर 15:31शुभ चौघड़िया है
साल की शुरुआत में आने वाले वाले नवरात्र को चैत्र नवरात्र कहा जाता है। इन नौ दिनों तक माता के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना होती है। वर्ष 2018 में चैत्र नवरात्रि 18 मार्च से शुरू हो रहा है। हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र नवरात्रि से ही नए साल की शुरुआत हो जाती है। इस बार 18 मार्च से नवरात्रि की शुरुआत होगी जो 25 मार्च को अष्टमी और नवमी तिथि तक रहेगी। यानी इस बार अष्टमी और नवमी एक ही दिन 25 मार्च को मनाई जाएंगी।
साल में नवरात्रि दो बार आती है पहला चैत्र में और दूसरा शारदीय नवरात्रि। नवरात्र मे कलश स्थापना की जाती है इस बर्ष में  18 मार्च से चैत्र नवरात्र का पूजन शुरू होगा और 25 मार्च को रामनवमी मनाया जायेगा। गौरतलब है कि मां दुर्गा के जिन स्वरूपों की पूजा होती है उनमें माता शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्रि देवी हैं जो दुर्गा के नौ अलग-अलग रूप हैं। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना की जाती है और फिर पहले दिन की देवी से पूजा शुरू हो जाती है।
महाराष्ट्र में Chaitra Navratri की शुरुआत गुड़ी पड़वा से और आन्ध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में उगादी से होती है।चैत्र शुक्ल पक्ष के नवरात्रों के साथ ही हिंदु नवसंवत्सर शुरू हो जाता हैं। जो की हिन्दु कैलेण्डर का पहला दिवस होता है। अतः भक्त लोग साल के प्रथम दिन से अगले नौ दिनों तक माता की पूजा कर वर्ष का शुभारम्भ करते हैं। भगवान राम का जन्मदिवस चैत्र नवरात्रि के अन्तिम दिन पड़ता है और इस कारण से चैत्र नवरात्रि को राम नवमी के नाम से भी जाना जाता है।
चैत्र नवरात्रि  में 24 मार्च को अष्टमी रहेगी। जो भक्त पूरे 9 दिन का व्रत रखेंगे उनका पारण 26 मार्च को है।
क्यों  करते हैं घटस्थापना
धर्मशास्त्रों के अनुसार कलश को सुख-समृद्धि, वैभव और मंगल कामनाओं का प्रतीक माना गया है। धारणा है की कलश के मुख में विष्णुजी का निवास, कंठ में रुद्र तथा मूल में ब्रह्मा स्थित होती हैं। साथ ही ये भी मान्याता है क‍ि कलश के मध्य में दैवीय मातृशक्तियां निवास करती हैं। इसलिए नवरात्र के शुभ द‍िनों में घटस्थाेपना की जाती है।
Chaitra Navratri 2018: ये है घट स्थापना के लिए सामग्री
- घट स्थापना के लिए कलश लें। ये मिट्टी ,सोना, चांदी, तांबा अथवा पीतल का हो सकता है। लेकिन लोहे या स्टील के कलश का प्रयोग न करें। साथ ही कलश ढकने के लिए ढक्कन।
- ढक्कन में रखने के लिए बिना टूटे चावल
- कलश में रखने के लिए कुछ सिक्के
-  मिट्टी का पात्र, मिट्टी और जौ :- जौ बोने के लिए मिट्टी का पात्र और शुद्ध साफ की हुई मिट्टी जिसमें जौ को बोया जा सके
- कलश में भरने के लिए शुद्ध जल। अगर गंगाजल मिल जाये तो उत्तम होता है
- पानी वाला नारियल और इस पर लपेटने के लिए लाल कपडा
- मोली या लाल सूत्र
- इत्र
- साबुत सुपारी
- दूर्वा
- पंचरत्न
- अशोक या आम के पत्ते
- फूल माला
Chaitra Navratri 2018: कलश स्थापना विधि
पूजा स्थल को शुद्ध करने के बाद इस पर लाल रंग का कपड़ा बिछाएं। कपड़े पर थोड़ा चावल रख लें और गणेश जी का स्मरण करें। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोना चाहिए। पात्र के उपर जल से भरा हुआ कलश स्थापित करें और इसके मुख पर रक्षा सूत्र बांध लें। कलश पर रोली से स्वास्तिक या ऊं बना लें। कलश के अंदर साबुत सुपारी, दूर्वा, फूल, सिक्का डालें। उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते रखें और फ‍िर ऊपर नारियल रख दें। इसके बाद इस पर लाल कपड़ा लपेट कर मोली लपेट दें।
अब कलश में सभी देवी देवताओं का आवाहन करें क‍ि नौ दिनों के लिए वे इसमें विराजमान हों। अब दीपक जलाकर कलश का पूजन करें। धूपबत्ती जलाएं, माला अर्पित करने के बाद कलश को फल, मिठाई, इत्र आद‍ि समर्पित करें।
*जौ ज्वारे का महत्व*
नवरात्रि में घर में ज्वारे या जौ बोए जाते हैं. अधिकांश लोग महत्व जाने बगैर इस परंपरा का ही निर्वाह करते चले आ रहे हैं. मान्यता है कि जब सृष्टि की शुरूआत हुई थी तो पहली फसल जौ ही थी. इसलिए इसे पूर्ण फसल कहा जाता है. यह हवन में देवी-देवताओं को चढ़ाई जाती है यही कारण है. वसंत ऋतु की पहली फसल जौं ही होती है, जिसे हम देवी को अर्पित करते हैं.
इसके अलावा मान्यता तो यह भी है कि जौ उगाने से भविष्य से संबंधित भी कुछ बातों के संकेत मिलते हैं. यदि जौ तेजी से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि तेजी से बढ़ती है. यदि जौ मुरझाए हुए या इनकी वृद्धि कम हुई हो तो भविष्य में कुछ अशुभ घटना का संकेत मिलता है.
*कन्या पूजन का महत्व*
हिंदू धर्म के अनुसार नवरात्रों में कन्या पूजन का विशेष महत्व है. मां भगवती के भक्त अष्टमी या नवमी को कन्याओं की विशेष पूजा करते हैं . 9 कुंवारी कन्याओं को सम्मानित ढंग से बुलाकर उनके पैर धोकर कर आसन पर बैठा कर भोजन करा कर सबको दक्षिणा और भेंट देते हैं.
श्रीमद् देवीभागवत के अनुसार कन्या पूजन के नियम
एक वर्ष की कन्या को नहीं बुलाना चाहिए, क्योंकि वह कन्या गंध भोग आदि पदार्थों के स्वाद से बिलकुल अनभिज्ञ रहती है.
‘कुमारी’ कन्या वह कहलाती है जो दो वर्ष की हो चुकी हो, तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति, चार वर्ष की कल्याणी , पांच वर्ष की रोहिणी, छ:वर्ष की कालिका, सात वर्ष की चण्डिका,आठ वर्षकी शाम्भवी, नौ वर्ष की दुर्गा और दस वर्ष की कन्या सुभद्रा कहलाती हैं.
इससे ऊपर की अवस्थावाली कन्या का पूजन नही करना चाहिए. कुमारियों की विधिवत पूजा करनी चाहिए. फिर स्वयं प्रसाद ग्रहण कर अपने व्रत को पूरा कर ब्राह्मण को दक्षिणा दे कर औऱ उनके पैर छू कर विदा करना चाहिए.
कन्याओं के पूजन से प्राप्त होने वाले लाभ
'कुमारी' नाम की कन्या जो दो वर्ष की होती हैं दुःख और दरिद्रता का नाश,शत्रुओं का क्षय और धन,आयु की वृद्धि करती हैं .
'त्रिमूर्ति' नाम की कन्या का पूजन करने से धर्म-अर्थ काम की पूर्ति होती हैं पुत्र- पौत्र आदि की वृद्धि होती है .
'कल्याणी' नाम की कन्या का नित्य पूजन करने से विद्या, विजय, सुख-समृद्धि प्राप्त होती है.
'रोहणी' नाम की कन्या के पूजन से रोगनाश हो जाता है.
'कालिका'  नाम की कन्या के पूजन से शत्रुओं का नाश होता है.
'चण्डिका' नाम की कन्या के पूजन से धन और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है.
'शाम्भवी' नाम की कन्या के पूजन से सम्मोहन, दुःख-दरिद्रता का नाश और किसी भी प्रकार के युद्ध (संग्राम) में विजय प्राप्त होती हैं .
'दुर्गा' नाम की कन्या के पूजन से क्रूर शत्रु का नाश, उग्र कर्म की साधना और परलोक में सुख पाने के लिए की जाती हैं
'सुभद्रा' नाम की कन्या के पूजन से मनुष्य के सभी  मनोरथ सिद्ध होते हैं.?

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