दिव्यांग विरांगना रितु चौबे

बिहार व्यूरो ,अनूप नारायण सिंह की खास रिपोर्ट :
एक ऐसी लड़की जिसके जन्म पर माता-पिता रोऐ क्योंकि हमारे समाज में बेटियों के लिए सोच ही कुछ ऐसी है तीसरी बेटी और जन्म के 10 महीने के बाद पोलियो से पीड़ित हो जाना एक माता-पिता के लिए इससे दुख की बात क्या हो सकती है पर अपनी संतान का मुंह ही कुछ ऐसा होता है माता-पिता ने हर वह खुशी कि जिसकी जिससे उनकी बेटी अपने पैरों पर खड़ी होकर चलने लगे दिल्ली कोलकाता चेन्नई हर जगह इलाज कराया और उनकी मेहनत सफल हुई धीरे-धीरे रितु चलने के काबिल होने लगी और पोलियो एक ऐसी बीमारी जो आज तक लाइलाज है इसको आज तक जड़ से खत्म नहीं किया जा सकता धीरे-धीरे समय बीतता गया पढ़ाई शुरू हुई स्कूल के दौरान भी हजारों मुश्किलों का सामना करना पड़ा 10th एग्जामिनेशन में फर्स्ट डिवीजन से पास हुई उसी समय पिता ने चाहा की शादी कर देनी चाहिए क्योंकि उनके सभी बेटियों की शादी कम उम्र में ही करने की प्रथा थी मैट्रिक एग्जाम के रिजल्ट के पहले ही शादी कर दी गई शादी करने में एक दिव्यांग बेटी की किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है यह एक माता-पिता ही जानते हैं कोई भी अपने घर एक अपाहिज लड़की को बहू बनाकर लाना नहीं चाहता यह भी सच है अंत एक दिव्यांग लड़के से शादी की गई पर ससुराल वालों ने उसे लड़के के दिमागी हालत के बारे में हर बात छुपाई झूठ बोल कर शादी कर दी गई ऐसे लड़के से जिसे अपनी जिम्मेदारियों से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था शादी के बाद हमारे यहां का रिवाज था उसी दौरान इंटर की पढ़ाई करने की जिद तूने की इंटर फर्स्ट डिवीजन से पास हुई पर 1 साल के बाद गौना कराया गया एक ऐसे माहौल में डाल दी गई यह जिसकी कल्पना भी नहीं की थी गांव का माहौल घूंघट लाज शर्म पर्दा गांव में मिटी के चूल्हे को देख कर बहुत रोई हिम्मत नहीं हारी हर जंग को लड़ने की हिम्मत शायद ऊपर वाले ने दी पर उन्हीं दिनों अपने पति की दिमागी हालत को देखकर 1 साल तक डिप्रेशन में चली गई पापा ने हर वह कोशिश की ताकि बेटी ठीक हो जाए उसी दौरान कंप्यूटर का कोर्स किया जिसमें भी अच्छे नंबरों से पास हुई फिर वही ससुराल वालों वही लोग शादी एक 5 साल तक संतान ना होने पर एक नया ताना आने लगा  लोग कहने लगे कभी मां नहीं बन सकती है फिर 5 साल बाद  भगवान की कृपा हुई और एक बेटे ने जन्म लिया काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा जब बेटा बड़ा होने लगा तभी 3 साल के बाद एक बेटी ने जन्म लिया दो बच्चों की जिम्मेदारी और पति की दिमागी हालत बहुत अच्छी ना होना एक एक पैसे के लिए दूसरों पर आश्रित होना पड़ता था एक रुपए के लिए दूसरे आगे हाथ फैलाना पड़ता था तब हिम्मत कि घर से बाहर निकलने की .इंटर पास को नौकरी कौन देता कंप्यूटर की भी सारी चीज भूल चुकी थी 8 साल घर मे रहने के कारण जिम्मेदारी की नई शुरुआत करने का समय शायद अब आ गया था .कई जगह रिज्यूम भेजा पर कोई खबर नहीं सरकार से लेकर प्राइवेट जॉब की तलाश शुरू की घर के किसी मेंबर की राय नहीं थी कि मैं नौकरी करू और आगे बढ़ू पर खुद में अब एक जिद थी  मुझे आगे बढ़ना है कुछ करना है खुद के लिए और अपने बच्चों के लिए उज्जवल भविष्य के लिए तभी एयरटेल ने मुझे रिसेप्शनिस्ट जॉब मिला जो 900 की थी 2004 में तब से मैं लगी रही कई बार मर्दों के  सामने हालात इतने बुरे होते कि कुछ समझ में नहीं आता क्या करूं पति का परिवार का कोई साथ नहीं 1 साल की कोशिश करने पर हर जगह यही सुनने को मिला कि हमें एक स्मार्ट वुमन चाहिए जो चल फिर सके चाहे उसके पास कोई डिग्री  नहीं हो इसी बीच मैंने ग्रेजुएशन की पढ़ाई की अपने जॉब के पैसे से ग्रेजुएशन के बाद मेरा सिलेक्शन हो गया पी7 जी के चैनल पार्टनर के यहां और आज भी पिछले 2010 से आज तक उसी कंपनी में कार्यरत हूँ। तभी मुझे लगा कि मैं तो आप एक अच्छी नौकरी में हूं दूसरे के लिए भी कुछ करना चाहिए जॉब के कारण बाहर कहीं जाने का मौका नहीं मिलता 600 महीने सोशल साइट का सहारा लिया Facebook पर ग्रुप बनाया वहां लोगों को जागरुक करने का फैसला लिया शुरू किया मैंने WhatsApp को जरिया शुरू किया लोगों की मदद करने की विकलांगों को लेकर कुछ करने की सोची जब जहां कुछ भी लगता मुझे कि मैं कर सकती हूं मैंने वह कोशिश कि चाहे दिव्यांगों की शादी हो दिव्यांगों को रोजगार दिलवाना हो या बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ हर जगह जितना पॉसिबल होता मैं करने लगी मैंने अपने ट्रस्ट शुरू किया दृष्टि चैरिटेबल ट्रस्ट में हर जरूरत को पूरी करने की कोशिश की जाती है अभी कर रही हूं अभी स्कूल में जहां लड़कियों को जागरूकता के साथ फ्री में ट्यूशन भी करती हूं 1 महीने पहले महिला की जानकारी मिली इसके घर वालों ने बीमारी के कारण घर से निकाल दिया था रात में गई मैं उससे उसके लिए हर वह कोशिश की मैंने सोशल साइट पर वायरल किया उसके प्रॉब्लम को न्यूज़ चैनल पर गई गुजरिया बनाया लोगों को जागरुक की मदद मिली आज मैं उस लड़की जिसका नाम रिंकी है उसके लिए पैसे से लेकर दवा क्या कर रही हूं बस कोशिश है कि कुछ बुरा ना हो मेरे हाथों मेरे दो बच्चे हैं एक बेटा और एक बेटी के साथ पिछले 8 साल से हंसी खुशी अपनी गाड़ी चला रही हूं एक छोटी सी प्राइवेट जॉब में है और साथ ही अच्छा लगता है जब वह लोग कभी नफरत करते थे दिव्यांग होने से उन लोगों के साथ मिलता है तब मां का दिल को सुकून मिलता है मुझसे बात करके खुशी होती है हमारा नाम लेकर बस एक सपना है कि कोई भी दिव्यांग भाई-बहन रोजगार के लिए वह सब जो मुझे सहना पड़ा उनके लिए काम कर रहे हो टाइम लगेगा पर सफलता जरूर मिलेगी मेरी कोशिश है कि मुझे देख कर कोई भी रुका हुआ इंसान अपनी जिंदगी शुरु कर सके यह मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि होगी सपने सच होते हुए सपने में मां और बेटी किसी ऐसे मुकाम पर पहुंचे कि वह सर उठा कर कह सके कि मैं एक दिव्यांग दंपति की संतान हूं इस पर मुझे गर्व है

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