दलित-पिछड़ा ने बदल कर रख दी सारी गुणा गणित
          विनय कुमार मिश्र
चौहद मार्च को घोषित हुए प्रदेश के दो संसदीय क्षेत्रों के उपचुनावों के नतीजों से साफ हो गया कि केन्द्र और उत्तर प्रदेश दोनों ही स्थानों पर सत्ता की बागडोर संभाल रही भारतीय जनता पार्टी जनता की नब्ज समझने में कामयाब नहीं रही या यू कहे कि चारों तरफ मिल रही जीत से उत्साहित भाजपा कहीं कोई चूक कर दी। कुछ सत्ता का दंभ, कुछ हाल ही में दूसरे प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में मिली भारी जीत से अति उत्साहित सत्ताधारी दल को पैर के नीचे जमीन पर हो रही हलचल नहीं दिखी और जिस नतिजे की उसने उम्मीद नही की थी अचानक उससे उसकों दो चार होना पड़ रहा है।अब जबकि प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार एक हफ्ते से भी कम समय में अपना एक साल पूरे करने वाली है, इस दोहरी हार ने जश्न का रंग फीका कर दिया है। इन नतीजों ने साबित कर दिया कि प्रदेश की जनता कुछ और चाहती है।अब कुछ करने की जरूरत है सिर्फ बयानों से जनता का कुछ नही हो सकता।
     दलित-पिछड़ा गठजोड़ की राजनीति को लेकर गत दिनों सपा-बसपा ने जो प्रयोग किया, उसका परिणाम शत-प्रतिशत उनके पक्ष में रहा। फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी दल को अति उत्साह ने ले डूबा।जब जमीन पर काम कर जनता को अपने पक्ष में करने का समय था, यह साबित करने का समय था कि योगी सरकार चुनाव के वक्त किये गये अपने सभी वादे पूरे करने के प्रति संकल्पबद्ध है, उस समय सरकार के मुखिया और उपमुखिया समेत तमाम भाजपा नेता विपक्ष की खिल्ली उड़ाने में लगे थे। कभी सांप-छुछूंदर तो कभी केर-बेर का उदाहरण इस गठजोड़ पर दिया गया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तत्कालीन सपा सरकार के वक्त उनके और बसपा अध्यक्ष के बीच हुए परस्पर प्रहार में इस्तेमाल 'बुआ और 'बबुआ शब्दों को लेकर दोनों का मजाक बनाया गया।ये सब अतिउत्साह की ही देन थी।
नये बने रिश्तों में कड़वाहट लाने के लिए भाजपा नेताओं की ओर से याद दिलाया गया कि अखिलेश के पिता पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने किस तरह बसपा सुप्रीमो का अपमान कराया था। यह और बात है कि खाली बातों वाली सारी कवायद धरी रह गयी और जनता ने साफ संदेश दे दिया कि धरातल पर काम नहीं हुआ तो हाहाकारी बहुमत दिलाने वाली जनता बहुत जोर का झटका भी दे सकती है।सोचने वाली बात भी यही है कि चार साल पहले लोकसभा चुनाव में और एक साल पहले ही विधानसभा चुनाव में कमल को हाहाकारी बहुमत दिलाने वाली जनता ने उसे बहुत जोर का झटका क्यों दिया? इस चुनाव में आश्चर्यजनक रूप से कम वोट पड़ा। गोरखपुर में 43 प्रतिशत तो फूलपुर में 38 फीसदी मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का प्रयोग किया। बताया जा रहा है कि इस कम मतदान में भी दलित, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का मतदान प्रतिशत अधिक रहा, जबकि सत्ताधारी दल का अपना वोट बैंक मतदान करने ही नहीं निकला। वह सिर्फ टीवी पर परिचर्चा ही देखता रह गया, और उसकी पार्टी का कमल मुरझा गया।
लोकसभा उपचुनाव को 2019 संसदीय चुनाव के सेमीफाइनल की तरह भी देखा जा रहा था, किन्तु मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री अपने ही गढ़ में पार्टी की साख गंवा बैठे। गोरखपुर और फूलपुर में भाजपा की हार साफ  तौर पर मुख्यमंत्री योगी आद‌ित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की हार है।  क्योंकि अगर भाजपा की जीत होती तो इसका श्रेय योगी व केशव को जाता। गोरखपुर सीट भाजपा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गढ़ मानी जाती है। मुख्यमंत्री गोरखपुर सीट से पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं, जबकि इससे पहले इस सीट से तीन बार योगी के गुरु महन्त अवैद्यनाथ सांसद रहे थे, लेकिन अब भाजपा से यह सीट छीन कर सपा ने नया इतिहास रच दिया है। इन परिणामों से जहां सपा-बसपा में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा, वहीं भाजपा को एक बार फिर अपनी रणनीति पर पुन: विचार करना होगा।

Post A Comment: