वर्तमान समय में पुलिस कर्मी एवं उनका परिवार मानसिक रूप से संघर्ष के रूप में अपना दिनचर्या का जीवन व्यतीत कर रहा है । पुलिसकर्मियों को काम के बोझ, अनियमित समय में काम करना, वरीय पदाधिकारियों की कभी - कभी अमर्यादित भाषा के द्वारा अपमानित होना , अनियमित खान पान, परिवार से अलग रहने, पर्व में भी परिवार  से अलग रहकर विधि व्यवस्था  ड्यूटी से तनाव उत्पन्न होता है और बीमारियों के शिकार होते हैं। अधिकतर पुलिस कर्मी के पास अनगिनत केश है जिसका अनुसंधान के लिए समय नही मिल पा रहा है । विडम्बना विभाग का है की केश के पर्वेक्षनकर्ता कई DSp द्वारा समय पर पर्वेक्षन नही दिया जाता है । यहाँ तक घटना स्थल का निरीक्षण किए बिना अनुसंधानकर्ता पर दबाव बना कर गवाह को अपने ओफिस में बुलाकर या रीडर को मिलने को बोल कर अपना कर्तव्य पूरा करते है । अनुसंधान पूर्ण हुवे बिना ज़बरन SP / DSp द्वारा केश को डिस्पोज़ल करने का दबाव या कराया जाता है जो क़ानूनी रूप से या न्याय की दृष्टिकोण से उचित नही है । वारंट का निस्पादन समय पर होना ज़रूरी है । पुलिस विभाग में केवल थाना प्रभारी की हर घटना की जवाबदेही निर्धारित करना अनुचित है । जवाबदेही जिले के SP से आरक्षी तक निर्धारित हो । जैसे अछे कार्य पर पुरस्कार सभी को मिलता है । थाने में थाना प्रभारी के अलावा अपर थाना प्रभारी के नाम से पोस्टिंग हो । पोस्टिंग में योग्यता - दक्षता - अनुभव - कर्मठता को ध्यान में रखते हुवे पारदर्शी रूप से सभी पुलिसकर्मियों की पोस्टिंग हो । एक थाने से दूसरे थाने बिना कारण हटाने से पुलिसकर्मी का जनता के बीच साख गिरता है और उसका कार्यक्षमता प्रभावित होता है । पुलिस कर्मी ग्रामीण क्षेत्र में जब भी भ्रमण करे ग़रीबों के बीच यानी उनके बीच जाए जो पुलिस के पास आने से डरते है । थाना प्रभारी - DSp - SP का मोबाइल नम्बर हर गाँव के मोहल्ले में लिपिबद्ध हो और लोगों को बाटा जाए । पुलिस विभाग में पुलिस एक्ट 2007 के सेक्शन - 10 के सभी विंदुवो का अनुपालन हो । जिसमें आरक्षी से लेकर DGP तक किसी भी पद पर पोस्टेड व्यक्ति को बिना कारण दो वर्ष के पहले हटाया नही जाए । ( प्रशासनिक दृष्टिकोण को छोड़ कर ) रोस्टर ड्यूटी पूर्णत जिले थाने में लागू हो । अपराध नियंत्रण और अनुसंधान की स्पष्ट पुलिसकर्मियों में कार्य बँटवारा हो । जिसका अभाव जिलो में दिखता है । जिसका दुष्परिणामों है की विधिव्यवस्था और अनुसंधान दोनो प्रभावित है । पुलिस कर्मियों को समय पर अवकाश नहीं मिलने से  उन्हें मानसिक आघात पहुँचता है और वे  डिप्रेशन के शिकार  होकर कभी अनुशासन  भंग करते हैं तो कभी आत्म हत्या या हत्या।  जबकि विभाग द्वारा  पर्याप्त अवकाश का प्रावधान  है।सभी विभागों में सप्ताह में एक या  दो  दिन का अवकाश होता है। मानवाधिकार  और श्रम संगठन भी पर्याप्त अवकाश  की आवश्यकता  को महसूस कर दिशा निर्देश  जारी करते  हैं। परन्तु  कुछ पदाधिकारी आवश्यकताओं, संवेदनाएं, दिशा निर्देश  को दरकिनार करने से  बाज नहीं आते। कोई धटना धटने के बाद आरोप प्रत्यारोप  व जाँच शुरू होती है। परिणाम जो भी हो कलंक तो लगता  ही है। 
           क्या ऐसी व्यवस्था  नहीं हो सकती कि पुलिसकर्मियों को अवकाश लेना जो पहले से देय ( निर्धारित ) है आवश्यक कर दिया  जाय   । ऐसी व्यवस्था  से  पुलिसकर्मी  और उनके परिवार  दोनों को मानसिक  शांति मिलेगी। पुलिसकर्मी उच्चाधिकारियों पर आरोप लगा भी नहीं पायेंगे।
         हम बिहार सरकार के गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय से आग्रह करते है की ऊपर वर्णित विंदुवो पर गहराई से विचार कर स्पष्ट दिशा - निर्देश जारी करे और जिले के हर ओफिस में इसका अनुपालन सुनिश्चहित कराए ।
    मृत्युंजय कु सिंह
   प्रदेश अध्यक्ष
बिहार पुलिस एसोंसीएशन

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