विनय कुमार मिश्र गोरखपुर ब्यूरों।
दिव्यांगता को अभिशाप मामने वालों के लिए गोराखपुर का जन्मांध बालक 'अमन' बहुत बड़ा मिसाल है। 12 साल की उम्र में उसकी यादाश्त ऐसी है कि हर कोई लोहा मान जाए। अमन को साल 2001 से 2100 तक का, मतलब 100 साल का कलेंडर पूरी तरह से याद है। कोई उससे किसी भी साल की तारीख को कौन सा दिन होगा पूछेगा तो तत्काल जवाब सही मिलेगा। यही नहीं देश दुनिया की तमाम बड़ी जानकारी उसकी जुबान पर बसी है। अमन जन्म से ही दिव्यांग है। उसे दोनों आंखों से दिखाई नहीं देता लेकिन वह तनिक भी हिम्मत नहीं हारता। शहर के राष्ट्रीय दृष्टिबाधित स्कूल में वह कक्षा चौथी का छात्र है और पूरी लगन से पढ़ाई करता है। अमन का स्वर भी बहुत अच्छा है। वह भजन से लेकर गीत तक बहुत ढंग से गाता है लेकिन, इस सबसे हटके जो उसकी सबसे खास पहचान और दिमागी कसरत को मिसाल बनाता है वह उसकी यादाश्त है। अमन से साल 2001 से साल 2100 के बीच की किसी भी तारीख में कौन सा दिन होगा, फौरन जवाब पाया जा सकता है। देश का जनरल नॉलेज हो या दुनिया का, भारत की राजधानी हो या अमेरिका कनाडा की, कुछ भी ऐसा नहीं है जिसका जवाब अमन बड़ी बेबाकी और शीघ्रता से ना दे दे। एक बातचीत में भी अमन बहुत सहजता के साथ अपने कौशल और मेधा का प्रदर्शन किया। उसने कहा सब कुछ याद करता हूं और फिर भूलता नहीं। वह आज ही अपना लक्ष्य निर्धारित कर चुका है और साल 2031 में वैज्ञानिक बनने की ठान रखा है। अमन की एक खास बात यह भी है कि अगर वह किसी से मिल लेता है और उसकी आवाज नाम पहचान लेता है तो दोबारा जब भी उस व्यक्ति से अमन की मुलाकात होगी वह तारीख और नाम सहित अगले की पहचान को बताकर अपना मुरीद बना लेता है। अमन की आंखों की रोशनी का जाना पूरे परिवार को दुख पहुंचाता है जिसे दूर करने के लिए सभी ने भरपूर कोशिश की लेकिन विधाता के सामने किसी कि नही चली। अमन अपने नाना मोतीलाल वर्मा का बहुत दुलारा है। जिसे लेकर वह इलाज के लिए देश के हर बड़े अस्पताल तक गए पर सफलता नहीं मिली तो वह निराश हुए लेकिन, अमन की क्षमता को देखकर उनकी निराशा आशा में बदल जाती है। अब सभी इसी उम्मीद पर हैं कि भगवान ने अगर आंखों की रोशनी छीनी तो उसे ज्ञान की ऐसी रोशनी दी है जो सभी को अपना कायल बना लेता है।

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