राज्य रक्षिणी बीमार होके बिन छुट्टी के मर गयी:- देव प्रकाश सिंह

मीडिया तेज प्रताप और ऐश्वर्या का बुखार नाप रही है। सुशासन का दम भरने वाली सरकार चुनाव के जोड़ घटाव में तल्लीन। कार्य करते हुए  रक्षिणी शहीद हो गयी पुलिस अफसर की निर्ममता एवं असंवेदनशील रवैया से। प्रशासन इधर उधर झांक रही। विद्वान लोग सदियों पुरानी पुलिस मैनुअल की दुहाई दे रहे। मैन्युअल कोई भी हो कैसी भी हो उसे पालन करने और कराने वाला इंसान ही होता है। पुलिस में अभी भी अंग्रेजियत गुलामी कूट कूट कर भरी है। उनके रहन सहन एवं खान पान की व्यवस्था बदतर नही, नारकीय है।
कार्य प्रणाली एवं नियमन की मूढ़ता एवं अंधता का मिशाल है दो दिन पहले का विद्रोह।
आप तनिक सोचें, नए बच्चे, वो भी लड़कियां, विशेषकर गरीब घरानों के बच्चियां इस सख्त पौरुष नौकरी जीविका के लिए आ गयी पुलिस सेवा में। सहती है गालियां, शोषण, प्रताड़ना फिर भी करती है काम। पापी पेट का सवाल है। घर परिवार के अरमानों का बोझ, पारिवारिक विपन्नता से निकलने की तम्मना , समाज मे स्वाभिमान से जीने की सोच लिए आई हैं ये बालाएं। क्या हो रहा है ?? छुट्टी मांगने पर मुंशी नग्न तस्वीर मांगता, और क्या क्या। क्या यही करने वे यहाँ लायी गईं हैं। इतनी बड़ी संख्या में महिला पुलिस बल की भर्ती की गई पर उनके प्रशिक्षण, रख रखाव , नियमन, प्रबंधन पर न तो कोई बैठक, न  व्यवस्था । सामाजिक जुर्म है ये। मानवाधिकार का मामला है। आप सोच सकते ये गरीब बच्चे इतने ज्यादा आग बबूले क्यों हुए। जो बिहार की  बच्चियां स्वभावतः सहिष्णुता एवं विनयी होते, वे ईंटा पत्थर फेंकने लगे, आग बबूला हो गए। इसकी पृष्ठभूमि में सघन रूप से जाना होगा डी जी पी साहब को। पटना की ये घटना शायद मात्र पटना की ही न हो, पूरे बिहार की हो। ये आंख खोलनेवाली घटना है। सरकार महलों एवं प्रासादों से जरा बाहर भी झांके। कभी मुख्यमंत्री जी को भी पुलिस लाइन जानी चाहिए। अब तक तो गंगा घाट के साथ साथ पुलिस लाइन का भी उन्हें एक चक्कर लगा लेनी चाहिए थी। दोष नेतृतव पर ही आता है। वैसे पूरे मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की भूमिका एवं नेतृत्व सराहनीय रहा जिन्होंने अपने संबोधन में कहा कि मेरे बच्चे समान हैं, आप लिखकर दें , आपकी बात सुनी जाएगी।
पर वरिष्ट अधिकारियों के रूटीन में नियमित पुलिस लाइन निरीक्षण, वहां के मेस का निरीक्षण एवं सिपाही मेस का खान जरूर खाना चाहिए।
आपको मालूम हो कि देश के उद्योगपति स्व धीरू भाई अम्बानी जब कभी अपने फैक्ट्री परिसर में जाया करते थे तो वे अपना भोजन मजदूरों के मेस में ही किया करते थे। कुछ चीज़ें हैं जो आज की अंग्रेजी शिक्षा से नहीं संस्कार एवं ज्ञान से आती हैं। अंग्रेज भी ऐसे नही थे। स्वयं रानी विक्टोरिया एक सिपाही तक कि सुना करती थी और आज एक रक्षिणी का उस शहर में मौत हो गया जहां की देवी यक्षिणी है। दुःखी हूँ, अब कलम रुंध गया।

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