नूतन कुमारी की रिपोर्ट
उजियारपुर प्रखंड अंतर्गत बेलारी पंचायत मे वरिष्ठ किसान आनंद कुमार के आवास पर बुधवार को डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पुसा के कृषि वैज्ञानिकों के द्वारा सूत्रकृमि नामक जीव के बारे मे विस्तृत रूप से जानकारी दी गई।
कृषि वैज्ञनिक डॉ॰ निशी केसरी ने सूत्रकृमि के बारे मे विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि सूत्रकृमि मिट्टी में रहने वाले एक प्रकार के जीव होते हैं, जो सूक्ष्म आंखों से दिखाई नहीं पड़ते। इन्हें देखने के लिए सूक्ष्मदर्शी का प्रयोग करना पड़ता है। इनका शरीर लंबा पतला तथा बेलनाकार होता है। यह देखने में सांप की तरह होते हैं तथा उन्हीं की तरह चलते हैं। इनका आकार 0.5 मिमी से 1 मीमी तक होता है।
इनके मुंह में भाले के आकार का एक अंग होता है। जिससे यह जड़ों की कोशिकाओं को छेद कर उस के अंदर चले जाते हैं, और उसका सारा द्रव खींच लेते हैं। इसके कारण पौधे कमजोर पड़ने लगते हैं। इस आक्रमण के बाद जड़ें फिर मिट्टी से जल तथा खनिज लवण को पौधा की टहनियों और पत्तों तक पहुंचा नहीं पाती है, नतीजतन पौधों की बढ़वार रुक जाती है तथा पैदावार कम हो जाती है।
पत्तियां पीली पड़ने लगती है पौधे दिन के समय मुरझाने लगते हैं, तथा धीरे-धीरे मरने लगते हैं। यदि पौधशाला में ही सूत्रकृमी का संक्रमण हो गया है तब तो कई पौधे वहीं मर जाते हैं। सूत्रकृमी करीब करीब सभी फसलों पर आक्रमण करते हैं। इन के आक्रमण से जड़े क्षतिग्रस्त हो जाती है जो आसपास के वातावरण में पाए जाने वाले दूसरे सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु विषाणु कवच इत्यादि को अपनी और आकर्षित करते हैं क्योंकि इन परजिवियों का इन क्षति ग्रस्त जड़ों से पोषण लेना काफी सरल हो जाता है।
जिससे तरह-तरह की बीमारियां फसलों में हो जाती है। इन बीमारियों का प्रबंधन काफी महंगा हो जाता है और किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। सूत्रकृमी अधिकतर मिट्टी में ही रहते हैं इसलिए किसान इन के बारे में जान नहीं पाते। इसलिए ये हमारे फसलों की गुप्त शत्रु कहलाते हैं। इनकी विभिन्न प्रजातियां होती है जो पौधों की जड़ों पत्तियों फूलों तथा फलों पर आक्रमण करती है और पौधों को नुकसान पहुंचाती।
डॉ॰ केएन पाठक ने किसानो को सूतकृमि ग्रसित पौधों के बारे मे जानकारी देते हुए कहा कि आपके खेतों अथवा बगीचों का वह पौधा जिसमे बौनापन दिखे, पत्तियां पीली पड़ जाए अथवा मुरझा जाए, पौधों की जड़ों मे छोटे बड़े गांठ बन जाए, गेहूं मे स्वस्थ दानों की जगह काले दाने बनने लगे, दिन के समय पौधों का मुरझा जाना इत्यादि सभी लक्ष्ण सूतकृमि के प्रकोप का है।
डॉ॰ यूएस सिंह ने कहा कि सूतकृमि नामक जीव से अपने पौधों तथा फसलों को बचाने के लिए गर्मी के महीनों मे खेतों की गहरी जुताई करें। पौधशाला मे पौध लगाकर उसे सफेद पॉलिथीन से ढंक दें। अपने खेतों को अनचाहे खर-पतवारों से बचाकर रखें। खेतों को कुछ समय के लिए परती छोड़ दिया करें, ताकि पोषण के अभाव मे इनकी आबादी मे कमी आ सके। खेतों मे पानी जमा कर 15-20 दिनों के लिए छोड़ दें ताकि जल जमाव से पानी मे ऑक्सीजन की मात्रा कम होने के कारण पानी बिषैला हो जाता है जिससे सूतकृमियों की मृत्यू हो जाती है। अपने खेतों मे फसल चक्र का उपयोग करें, यह सूतकृमि को कम करने मे सहायक होती है।
संगोष्ठी मे डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा के कृषि वैज्ञानिक डॉ॰ निशी केसरी, डॉ॰ के एन पाठक, डॉ॰ यूएस सिंह के अलावे डॉ॰ एस के विश्नी तथा डॉ॰पीके झा एवं ग्रामीणों मे ग्राम पंचायत बेलारी के सरपंच श्री योगेन्द्र सिंह, दिलीप कुमार, हरि किशोर प्रसाद सिंह, शिव प्रसाद सिंह, सुजीत कुमार सामाजिक कार्यकर्ता अशोक पुष्पम सहित सैकड़ो ग्रामीण व किसान उपस्थित थे।

Post A Comment: