पलटन साहनी के साथ ब्रजेश नूतन की रिपोर्ट

समस्तीपुर जिले के रोसरा अनुमंडल रोसरा थाना के भिड़हा गाँव में 1836ई0 से ब्रज की तर्ज पर होली उत्सव मनाया जाता है।

प्रतिकारक चित्र पिछले वर्ष को
राष्ट्रकवि दिनकर ने इसे बिहार का वृन्दावन कहा था। भिड़हा होली की यही पहचान निराला है ऐसी व्यवस्था भिड़हा के हर बुजुर्ग, जवान,  बच्चे, अपना दायित्व समझते है..

 जहां आज भी जीवन्त है ब्रज के तर्ज पर होली खेलने की परम्परा। इसके इतिहास पर नजर डालें तो सन 1835 में गांव के कई बुजुर्ग एक साथ होली देखने वृन्दावन गए थे। वहां से लौटने के पश्चात ग्रामीणों द्वारा लिये गए निर्णयों पर वर्ष 1836 से भिरहा में ब्रज की तर्ज पर होली उत्सव मनाना प्रारंभ किया गया। लगातार 105 वर्षो तक एकसाथ होली मनाने के बाद वर्ष 1941 में घनी आबादी वाला यह गांव तीन भागों में बंटकर होली मनाने लगा। गांव के तीनों टोल एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ में सजावट के साथ साथ अच्छे से अच्छा बैण्ड पार्टी एवं नर्तकी लाने का प्रयास करते हैं।

 होली से एक दिन पूर्व होलिका दहन की संध्या से ही पूरब, पश्चिम एवं उत्तर टोले में निर्धारित स्थानों पर अलग अलग नर्तकियों का नृत्य जारी रहता है। मध्य रात्रि के बाद गाजे बाजे के साथ तीनों टोले से निकला जुलूस गांव के विद्यालय के प्रांगण में पहुंचती है। जहां विशाल_होलिका_दहन के पश्चात पटना और बनारस , राजस्थान, से आये तीनों बैण्ड पार्टी के बीच होती है घंटो प्रतियोगिता। उसमें प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले को पुरस्कार से भी नवाजा जाता है। इस दौरान क्षेत्र के हजारों लोग उपस्थित रहते हैं। बड़े बड़े तोरण द्वार और चमचमाते रोलेक्स के बीच सम्पूर्ण गांव पूरी रात दुधिया रोशनी से जगमग रहता है। होली के दिन भी नृत्य का आनन्द लेने के पश्चात तीनों टोली दोपहर बाद गांव के एक किनारे स्थित फगुआ पोखर पहुंचते हैं जहां पूरे गांव के लोग सभी प्रतिद्वंदिता एवं वैमनस्यता को त्याग कर दो भागों में विभक्त हो जाते हैं। सैकड़ों हाथों से घंटों चलती रहती है रंगो की पिचकारी जिससे पोखर का पानी भी गुलाबी रंग में बदल जाता है। भिरहा की होली न सिर्फ मिथिलांचल में बल्कि देश स्तर पर इसकी एक अलग पहचान है।

आज तक इतिहास रहा है भिड़हा मे होली के महौल मे  इतनी भीड़ जुटने पर भी वहाँ पर चोरी लूट,महिलाएँ के साथ छेड़ छाड़ की घटना आज तक सुनने को नही मिला है !

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